दिल्ली में फिलीस्तीन में हो रहे जुल्म के खिलाफ धरने में वहदते इस्लामी के अमीर मोहतरम जियाउद्दीन सिद्दीकी साहब का बयान….”फिलिस्तीन के मस्ले ने जम्हूरियत, मानव अधिकार के ठेकेदार, मगरीबी मुल्कों और UNO को नंगा कर दिया है..”

हज़रात!
जिस मक़सद के लिए हम यहाँ जमा हुए हैं, एक ऐसा इश्यू है जिस पर दो साल से हम काफ़ी ग़मगीन भी हैं और इस को अपने सीनों से और दिल-ओ-दिमाग़ से लगाए भी हुए हैं। इस हवाले से कि फ़लस्तीन जो कभी था वो मिटाया जा रहा है, उसके नक़्श मिटाए जा रहे हैं, ग़ज़ा ऑक्यूपाई- occupy किया जा रहा है और वेस्ट बैंक के अंदर कोशिशें की दा रही हैं कि सेटलमेंट ज़्यादा से ज़्यादा की जाएँ। हम सब मिल कर इस की पुरज़ोर मज़म्मत करते हैं और आलम-ए-इंसानियत और आलम-ए-इस्लाम से अपील करते हैं कि फ़लस्तीनियों को उनका अपना मुल्क मिलना चाहिए, इस के लिए हम सब को भरपूर कोशिश करनी चाहिए।
दूसरी बात मैं आप से अर्ज़ करना चाहता हूँ कि फ़लस्तीन ही इस वक़्त एक ऐसा सेन्टर पॉइंट है, दुनिया में जिस ने दुनिया के सारे नक़ाबों को उतार दिया है। जो कभी जम्हूरियत-डेमोक्रेसी के उनवान से समझाए जाते थे, कभी ह्यूमन राइट्स के उनवान से, कभी इंसानों की इज़्ज़त-ओ-एहतराम के हवाले से। ये सारे नक़ाब हट गए हैं और फ़लस्तीन ने सब को इस हमाम में नंगा कर दिया है। चाहे वो U.N.O. हो, या मग़रिबी मुल्क हो या यूरोपियन कंट्रीज़ — सब के सब इस हमाम में नंगे हो गए हैं।
हम अपनी आँखों से देख रहे हैं कि मासूम बच्चों का क़त्ल-ए-आम हो रहा है। जो लोग जानवरों पर रोते हैं, उनकी ज़िंदगियों के लिए हाहाकार मचाते हैं, उन जानवरों के उसूल-ओ-ज़वाबित बनाते हैं लेकिन इंसानों की ज़िंदगी पर उन्हें कोई एहसास नहीं होता। ये बात फ़लस्तीन ने दुनिया को समझा दी है कि उनके चेहरे कितने मक़रूह हैं और उनका अंदरून कितना गंदा है।
तीसरी बात, फ़लस्तीन ने ये बताई है कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आज भी वोह खड़े हैं। उन्होंने घुटने नहीं टेके। फिलिस्तीन आज दुनिया के सबसे बड़े ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा है। शहादतों और ज़ख़्मी लोगों की इतनी बड़ी तादाद होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कहा कि:- “हम घुटने नहीं टेकेँगे, इस ज़ुल्म का मुक़ाबला करेंगे, और इंशा-अल्लाह कामयाबी और कामरानी हमारी किस्मत होगी।” दुनिया ये सब अपनी खुली आँखों से देख रही है।
अख्लाकी तौर पर फ़िलिस्तीन जीत गया है। अगर ऑक्यूपेशन- occupation के हवाले से देखें तो मुमकिन है कि वो अभी कामयाब न हुए हों, लेकिन अख्लाकी एतिबार से वो जीत गए हैं। सियासी तौर पर भी उन की कामयाबी हो चुकी है।
फ़िलिस्तीन ने दुनिया को ज़िंदगी और मौत का फ़लसफ़ा समझाने में भी एक बड़ा रोल प्ले किया है।
एक लड़की ये कहती है कि “मेरी ताज़ियत न करें, मुझे ख़ुशी नहीं होगी इस बात की कि आप मेरे घर वालों के मारे जाने पर ताज़ियत करें। मुझे ख़ुशी इस बात पर होगी कि आप मुझे मुबारकबाद दें कि मेरे घर में इतने शहीद हुए हैं।” ये सोच को दुनिया की कोई ताक़त हरा नहीं सकती, और इंशा-अल्लाह यही सोच दुनिया पर ग़ालिब आएगी।
अब मैं एक वाक़िया बयान करना चाहता हूँ। वेस्ट बैंक के अंदर एक लड़की के बारे में आता है कि वो नक़ाब में जा रही थी। एक इस्राइली फौजी ने उसके नक़ाब को खींचने की कोशिश की, उसने मुकाबला किया। नतीजतन उसे शूट कर दिया गया। उसी वक़्त एक फिलिस्तीनी लड़का वहाँ से गुज़र रहा था, उसने ये मंज़र देखा और उस ने ग़ुस्से में आ कर फौजी को मार दिया। फिर फौजियों ने उस फिलीस्तीनी लड़के को भी शहीद कर दिया। यूँ लड़का और लड़की दोनों शहीद हो गए।
जब दोनों के जनाज़े रखे गए तो लड़के का बाप, लड़की के बाप से मिला और कहा: “अगर तुम मुनासिब समझो तो मेरी एक दरख़्वास्त क़बूल कर लो। अपनी लड़की का हाथ मेरे लड़के के लिए दे दो, यहाँ आज हम निकाह पढ़ा दें।” लड़की का बाप हैरान हुआ और कहा: “अजीब बात है कि लाशें पड़ी हैं और तुम निकाह की बात करते हो?” तो उसने कहा: “क्या तुम ने क़ुरआन नहीं पढ़ा? जिस में कहा गया है कि जो अल्लाह की राह में मारे जाते हैं वो शहीद हैं, वह अल्लाह से रिज़्क़ पाते हैं, वो ज़िंदा हैं।” फिर दोनों का निकाह पढ़ाया गया और उस के बाद तद्फ़ीन अमल में आई।
ये फ़लसफ़ा-ए-हयात-ओ-ममात (जिंदगी और मौत की फिलोसोफी) फ़िलिस्तीन ने दुनिया को अमली एतिबार से समझा दिया है। मग़रिबज़दा-western नज़रियात सब के सब खोखले साबित हो चुके हैं। वो इस्राईल जिस को अल्लाह ने मन-ओ-सल्वा अता किया था, वो इस्राईल जिन्हें पानी के चश्मे अता किए गए थे, आज वही फ़लस्तीनियों को पानी के एक-एक क़तरे और खाने की छोटी-छोटी चीज़ों को तरसा रहा है। ये एहसान-फ़रामोशी है और अल्लाह एहसान-फ़रामोशी को कभी माफ़ नहीं करेगा।
ज़मीन के ऊपर कमज़ोरों और मज़लूमों के ज़रिए ही सब कुछ दुरुस्त किया जाएगा। आने वाला वक़्त बताएगा कि अल्लाह तआला किस तरह कमज़ोरों को ज़ालिमों पर ग़ालिब करता है।
हम इस मौक़े पर फ़लस्तीन और ग़ज़ा पर होने वाले ज़ुल्म की मज़म्मत करते हैं। हम उन तमाम ऑक्यूपेशंस और जेनोसाइड- नरसंहार की भी मज़म्मत करते हैं। हम अपनी हुकूमत से अपील करते हैं कि फ़िलिस्तीन की पॉलिसी की लाज रखें और यू.एन.ओ. के अंदर भी, बाहर भी, और मदद के पैमानों को पूरा करते हुए अमली किरदार अदा करें।
हम तमाम इन्साफ़-पसंद लोगों से अपील करते हैं कि ग़ज़ा के इस ग़म और दर्द में शरीक हों और उनकी कामयाबी के लिए दुआएँ करें।
हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि:
“ऐ अल्लाह! हमें भी हिम्मत और हौसला अता फ़रमा कि हम ग़ज़ा के साथ खड़े रहें, और दुनिया के इंसाफ़पसंदों को भी हौसला अता फ़रमा कि वो ग़ज़ा के साथ खड़े रहें, और हमारे लोगों को भी ये तौफ़ीक़ दे कि वो आख़िरी दम तक हक़-ओ-इंसाफ़ के लिए कोशिश करते रहें।”
वा आख़िरु दआवाना अनिल-हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन.